हर तरह जब मेरी हिम्मत आज़मा ली जाएगी
ज़ुल्म की फिर इक नई बुनियाद डाली जाएगी
सिर्फ़ कुछ लोगों की शाबाशी उन्हें काफ़ी नहीं
इक ज़माने से अभी दाद-ए-वफ़ा ली जाएगी
हम समझते थे कि दिल जाता है उल्फ़त में मगर
क्या ख़बर थी नींद आँखों से चुरा ली जाएगी
रेज़ा-रेज़ा हो के बिखरेगा बदन का सब ग़ुरूर
ख़ाक के पुतले पे जिस दम ख़ाक डाली जाएगी
दुश्मनान-ए-बज़्म-ए-उर्दू में पढ़ें क्या हम ग़ज़ल
जैसे-तैसे फ़न की बस हुरमत बचा ली जाएगी
Moid Rahbar Lucknowi