शौक़ भी है ये एहतियाज भी है
शाइराना मेरा मिज़ाज भी है
शाइरी रोग ही नहीं मेरा
ये मेरे रोग का इलाज भी है
एक कासा है उसके हाथों में
उसके क़दमों में तख़्त-ओ-ताज भी है
ऐ मुसाफ़िर मेरे गले लग जा
ये मेरे शह्र का रिवाज भी है
कौन पूछेगा ये सुख़नवर से
तेरे चौके में क्या अनाज भी है
सुब्ह से शाम सिर्फ़ शेर ग़ज़ल
तुझको कुछ और काम-काज भी है?
उसके दम से ही 'दीप' है रौशन
वो जो कल भी था और आज भी है
BHARAT DEEP MATHUR