मैं शिलाओं का विखंडन कर नहीं सकता सखे पर
आपदाओं का प्रबंधन कर नहीं सकता सखे पर
कोशिशों के स्वेद कण से मैं इन्हें आकार दूँगा
मैं तुम्हें बस प्यार दूँगा!
ये अमावस के अँधेरे ले रहे हैं सात फेरे
संग मिल काली निशा के छीनते हैं ये सवेरे
इन अँधेरों पर समर्पण कर नहीं सकता सखे पर
पत्थरों पर अश्रु अर्पण कर नहीं सकता सखे पर
इसलिए मैं दीप बनकर ये अँधेरा मार दूँगा
मैं तुम्हें बस प्यार दूँगा!
छल-कपट की बात को करना नहीं मैं जानता हूँ
कंटको की चाल भी चलना नहीं मैं जानता हूँ
सच के सागर का भी मंथन कर नहीं सकता सखे पर
व्यर्थ उसपर और क्रन्दन कर नहीं सकता सखे पर
इसलिए मैं प्रेम पर ही एक जीवन वार दूँगा
मैं तुम्हें बस प्यार दूँगा!
देवकी नन्दन मिश्र 'देव्यन'