पिताजी कम नहीं माँ से

उन्हें हमसे मुहब्बत जैसे माली को गुलिस्ताँ से
हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से
हमें उँगली पकड़कर पहले चलना भी सिखाते हैं
अगर ठोकर लगे तो फिर उठा दिल से लगाते हैं
हमारे घर का सूरज हैं उजाला उनके दम से है
मुसीबत से हमें लड़ना सँभलना भी सिखाते हैं
जुड़े हैं ख़्वाब उनके सब हमारे ही दिल-ओ-जाँ से
हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से

अगर नाराज़ होकर वह कभी झिड़की लगाते हैं
तो दुनिया की सदाक़त से हमें वाक़िफ़ कराते हैं
मुक़द्दर में लिखा है क्या किसी को यह पता है कब
पिताजी तरबियत करते हैं तक़दीरें बनाते हैं            
मुसलसल कुछ न कुछ मिलता है हमको उनके दामाँ से
हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से

नसीहत देके सारी लग़ज़िशों को दर-गुज़र करना
वो कहते हैं बुरी बातों से हर लम्हा हज़र करना
सदाक़त और अच्छाई के गुण ख़ुद में करो पैदा
पिताजी ने सिखाया है मुहब्बत का सफ़र करना
बना देते हैं गुलशन ज़िंदगी को दश्ते वीराँ से
हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से

बड़ी तकलीफ़ होती है मुझे जब हाथ मलते हैं
मुसीबत में वही तो बस हमारे साथ चलते हैं
हर इक मौसम में कस्बे रिज़्क़ को घर से निकलते हैं
हमारे वास्ते ग़म को भी ख़ुशियों में बदलते हैं
बचाते हैं वो कश्ती ज़िंदगी की मौज़-ए-तूफ़ाँ से          हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से

जवाँ हमको बनाते हैं लहू अपना जलाते हैं
हमें गर चोट लग जाए वही आँसू बहाते हैं
हज़ारों ग़म सही लेकिन हमेशा मुस्कुराते हैं
सदा ही ख़ुश रहें हम सब यही सपने सजाते हैं
तमन्नाएँ जुड़ी उनकी हमारे एक अरमाँ से
हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से

मेरी नज़रों से देखो तो सिकंदर भी पिताजी हैं
हक़ीक़त में मुहब्बत का समन्दर भी पिताजी हैं
दोबारा मैं जनम पाऊँ तो उनकी गोद में खेलूँ
ख़ुशी दुनिया की देने को मुक़र्रर भी पिताजी हैं
मिरे जीवन को चमकाया इरादों के चराग़ाँ से
हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से

तबीयत से निहायत मेहनती हैं कामकाजी हैं
तअल्लुक़ राब्ते में देखिये सच्चे समाजी हैं
इमारत ख़ानदानी देखने में जो नज़र आये
मकाँ की नींव का पत्थर पिताजी के पिताजी हैं
ख़ुदा उनको बचाकर रख हमेशा रंजे दौराँ से
हक़ीक़त यह है दुनिया की पिताजी कम नहीं माँ से
Aatish Muradabadi

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