अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

झूठी जय - जयकारों से तो सन्नाटे ही अच्छे हैं।
ऊँचा ओहदा तुम्हें मुबारक हम नाटे ही अच्छे हैं।
लाभ नफ़ा में बिक जाने से बेहतर है सूखी रोटी।
स्वाभिमान ही बचा रहे तो ये घाटे ही अच्छे हैं।।
षड्यंत्रों में कटती रातें और दिवस अंजाम दिये।
ऐसे उम्र ढलाने से दिन बिन काटे ही अच्छे हैं।
लाचारी भुखमरी लील ले फिर हारों से क्या लेना।
ऐसे लाशों पर फूलों से तो काँटे ही अच्छे हैं।
धीरे- धीरे पैर डगर जो अपराधों की जाते हों।
उन कंधों को शाबाशी से दो चाँटे ही अच्छे हैं।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

अंकित शर्मा 'इषुप्रिय' | We The Sukhanwar