Ayush

जैसे असीर होके रिहा इक अज़ाब से
कोई निकल के आ गया है अपने ख़्वाब से

आँखों से रात-भर यहाँ बहती है इक नदी
उकता गया हूँ ज़िंदगी के इज़्तिराब से

इक शब डरा दिया दिये ने तीरगी को फ़िर
वो कर रहा बराबरी अब आफ़ताब से

साक़ी पिला दे घूँट मुझे उसके चश्म की
चढ़ता नहीं नशा मुझे तेरे शराब से

सच बोलके मिलेगी सज़ा उम्र-क़ैद की
मैं डर रहा हूँ मुल्क़ में इस इंक़िलाब से

यूँ हाथ जोड़ने का सलीक़ा तो सीख ले
तू बात कर रहा है किसी कामयाब से

दो-चार यार, इश्क़, सफ़र और शाइरी
अब चल रही है ज़िंदगी मेरे हिसाब से
Ayush