Aatish Muradabadi

तेरा दयार-ए-यार में आने का शुक्रिया
हमराह बनके साथ निभाने का शुक्रिया

छानी है खाक़ दिल ने बहुत दर-बदर रहा
दिल को मेरे भी राह दिखाने का शुक्रिया

मेरे ग़मों को अपना लिया ज़ौक़-शौक़ से
दिल था मेरा उदास हँसाने का शुक्रिया

गुलशन में बागवान खिलाता है फूल को
सहरा में आके फूल खिलाने का शुक्रिया

बिखरा हुआ था मैं किसी सामान की तरह
दिल के नगर को मेरे सजाने का शुक्रिया

उलझी थी मेरी जिंदगी ज़ुल्फ़ों की तरह से
उल्फ़त की गाँठ इसमें लगाने का शुक्रिया

तुम मिल गए तो और क्या चाहूँ खुदा से मैं
मंदिर-से दिल में मुझको बसाने का शुक्रिया

मुद्दत से इन लबों पे थी तारी ये तिश्नगी
प्यासे लबों कि प्यास बुझाने का शुक्रिया

तेरी निगाहें नाज़ का एहसान है बहुत
पत्थर जिगर को मोम बनाने का शुक्रिया

भर करके मेरे नाम का सिंदूर माँग में
'आतिश' के रूह दिल में समाने का शुक्रिया
Aatish Muradabadi