भाग्य का था उदय तो मिटी वेदना
और दुःख दर्द जैसे हवा हो गया
उर्वशी के सदृश तुम मेरे उर बसी
और मन प्रेम में पुरुरवा हो गया
नित्य गाता रहा प्रेम के छन्द मैं
और तुम स्वप्न बन नित्य आती रहीं
जैसे आकाश से भाग्य की अप्सरा
अपने नज़दीक मुझको बुलाती रही
इस हृदय-प्रान्त में प्रेम का अर्थ तो
दर्द ही था मगर अब दवा हो गया
प्राण बेसुध हुए मन प्रतीक्षित बना
कल्पना में तुम्हारी रमा नित्य मन
भाव विन्यास सब थे समेकित हुए
आस की देहरी पर थमा नित्य मन
राजमहलों सा सुख-बोध आने लगा
जब लगा ये हृदय पेशवा हो गया
कीर्तिमाला सदृश आ गले लग गईं
प्राण मधुगंध पाकर महकने लगे
अलि समूहों ने दर्शन किया रूप का
और उनके क़दम भी बहकने लगे
व्योम गुंजित हुआ उस भ्रमर-गीत से
ताल जिसका अमर कहरवा हो गया
देवकी नन्दन मिश्र 'देव्यन'