Upendra singh

वो अपना काम करता है, है उसका काम जलने का
दिया कब रास्ता देखे किसी सूरज के उगने का

दिया है हुक़्म उसने तब मुझे दिल से निकलने का
बचा ही जब नहीं मेरा ठिकाना और रहने का

बदन पर धूप की साड़ी लटों में चाँद का जूड़ा
लुभाता खूब है मुझको तेरा अंदाज़ सजने का

वो उसका मुस्कुराना फिर पलटकर देखना पीछे
मिला मौक़ा नहीं इक बार भी मुझको सँभलने का

मेरे मैसेज के बदले बस इमोजी भेज देता है
कभी जब मन नही होता है उसका बात करने का

बिछड़कर उसने जो मुझसे लगाई फोन पर अपने
मेरा मन ख़ूब होता है वो कॉलरट्यून सुनने का

हम ऐसे बीज हैं जिनको दबा सकती नहीं दुनिया
हुनर आता है हमको आख़िरश पत्थर पे उगने का
Upendra singh

Upendra singh | We The Sukhanwar