ख़ामोशियों को मेरी समझने लगी हो तुम
मुझसे ज़्यादा जैसे मुझे जानती हो तुम
महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुद में तुम्हें कहीं
ऐसे कि जैसे मुझमें ही रहने लगी हो तुम
ज़ाहिर में तुम ख़फ़ा हो मगर जानता हूँ मैं
दिल को मेरे ख़्याल से बहला रही हो तुम
जब भी तुम्हारे दर से गुज़रता हूँ जाने क्यों
लगता है जैसे छुपके मुझे देखती हो तुम
तारीफ़ अब तुम्हारी भला क्या करे कोई
क़ुदरत का शाहकार हो जादूगरी हो तुम
वह लफ़्ज़ अब भी नक़्श हैं ज़हन ओ गुमान में
तुमने कभी कहा था मेरी ज़िंदगी हो तुम
Mohd Shakir Khan