मेरे दिल को क्या कोई ग़म है अभी तक
इसी फिक्र में चश्म-ए-नम है अभी तक
सँवारा बहुत मैंने ज़ुल्फों को उसकी
मगर उसकी जुल्फों में ख़म है अभी तक
परेशाँ हूँ मैं कैसे उसको मनाऊँ
ख़फा मुझसे मेरा सनम है अभी तक
मुहब्बत के पैग़ाम जिससे लिखे थे
मेरे हाथ में वो क़लम है अभी तक
कहीं बुझ न जाए ये शम्म-ए-मुहब्बत
चले आओ आँखों में दम है अभी तक
मैं मंज़िल की जानिब चला जा रहा हूँ
किसी का यह मुझपर करम है अभी तक
अभी ख़्वाब उसके हैं आँखों में 'आतिश'
मुहब्बत का क़ायम भरम है अभी तक
Aatish Muradabadi