इतना बता रही हैं ग़र्क़ाब कश्तियाँ
पानी में मिल गईं सब नायाब कश्तियाँ
हम नाख़ुदा, हमेशा सैलाब में रहे
हर-सू हमारे मौजें, गिर्दाब, कश्तियाँ
तूफ़ान में भी डटकर दरिया में जो चलीं
आख़िर कहाँ गईं वे सीमाब कश्तियाँ
धोखे का इक तलातुम, आज़ाब जैसे गुज़रा
पल में उजड़ गईं कुछ शादाब कश्तियाँ
ए काश ऐसा मंज़र हो आसपास में
ऊँचे पहाड़ हों ओ' तालाब, कश्तियाँ
Satyendra Bharill