Nakul Kumar

तुमको लगता है तुम्हारी ज़िंदगी पुर-नूर है
देख लो इक बार फिर से रौशनी कुछ दूर है

साथ में घर बार लेकर चल रही हैं औरतें
सोचते हो तुम ये केवल माँग में सिंदूर है

नौ नए लड़कों को अब तक खा गई नौ-नौ दफ़ा
ये तुम्हारे शहर में क़ातिल हवा या हूर है

सर पकड़कर डिग्रियों को देखता है नौजवाँ
मुल्क़ में इस वक़्त बेकारी बहुत मशहूर है

ईंट के भट्टों पे अपना तोड़ता है तन-बदन
ये किसी का बाप है मज़दूर है मज़बूर है

इश्क़ में हो बेवफ़ाई, बेहयाई, बेकली
तुमको गर मंज़ूर है तो हमको भी मंज़ूर है
Nakul Kumar