Nakul Kumar

मुझे पानी जो अब लाकर दिया है
किसी प्यासे के घर मातम हुआ है

मुझे आदत-सी है अब तो तपन की
तभी सूरज पे मैंने घर लिया है

मुझे बरसों से कोई भूख-सी है
कि मैंने ख़ुद को ही अब खा लिया है

सभी के जिस्म पीले पड़ गए हैं
लहू मेरा यहाँ जिसने पिया है

मैं रुकता हूँ सदा शमशान जाकर
मिरे अंदर कोई मरकर जिया है

मैं ख़ुद ही दाँव पे हूँ अपनी ख़ातिर
ये मेरी ज़िंदगी है या जुआ है

मेरे जीने की आशा बिन तुम्हारे
दुआ के साथ कोई बद्दुआ है
Nakul Kumar