अब पैकर-ए-ख़्याल-ए-सनम बन गया हूँ मैं
यानी वजूद-ए-लुत्फ़-ओ-करम बन गया हूँ मैं
यूँ छू रही हैं मुझ को वो रंगीन उंगलियाँ
जैसे हसीन ज़ुल्फ़ का ख़म बन गया हूँ मैं
मेरे ही दम से दैर-ओ-हरम में है रौशनी
कंदील-ए-दैर शम्म-ए-हरम बन गया हूँ मैं
क्यों मेरी सम्त उठने लगी है वो बार-बार
क्यों मरकज़-ए-निगाह-ए-करम बन गया हूँ मैं
करती है रहगुज़ार भी अब मेरा एहतेराम
किस नाज़नीन का नक़्श-ए-क़दम बन गया हूँ मैं
मुझको तिरी निगाह-ए-करम की थी आरज़ू
ये क्या हुआ कि मश्क़-ए-सितम बन गया हूँ मैं
जब तुम न थे तो एक जहन्नुम थी ज़िन्दगी
तुम आ गए तो बाग़-ए-इरम बन गया हूँ मैं
पढ़ने लगे हैं वो भी रिसालों को शौक से
जब से 'नदीम' अहल-ए-क़लम बन गया हूँ मैं
Khalid Nadeem Budauni