हसद की आग में हर सू हैं जलने वाले लोग
कहाँ हैं मोम की सूरत पिघलने वाले लोग
जिमीं के कर्ब से अब तक जो रू-शनास नहीं
बुलन्दियों से वही हैं फिसलने वाले लोग
हमारे चेहरे की तसवीर खेंचकर रखलो
हमीं हैं ठोकरें खाकर सँभलने वाले लोग
यहाँ नहीं है गुलाबों का क़द्र-दाँ कोई
हैं बात-बात पे पहलू बदलने वाले लोग
मिरे जमीर की क़ीमत लगाने आए थे
अमीर-ए-शहर के टुकड़ों पे पलने वाले लोग
दिखाना चाहिए जौहर जहाँ फसाहत के
वहाँ भी बैठे हैं उर्दू निगलने वाले लोग
तुम अपनी बात लबों के हिसार में रखना
यहाँ ज़ुबाँ से हैं आतिश उगलने वाले लोग
हर एक सिम्त घटा नफ़रतों की है 'ख़ालिद'
बराए-नाम हैं उल्फ़त पे चलने वाले लोग
Khalid Nadeem Budauni