वफ़ा से दूर होते जा रहे हैं
वो अब मग़रूर होते जा रहे हैं
फिर उनका क़ुर्ब पाएँगे किसी दिन
जो हम से दूर होते जा रहे हैं
कभी जिन के मुक़द्दर में थीं ख़ुशियाँ
ग़मों से चूर होते जा रहे हैं
सजाए थे जो ख़्वाब आँखों में मैंने
वो चकनाचूर होते जा रहे हैं
दिए थे ज़ख़्म जितने अक़रबा ने
वो अब नासूर होते जा रहे हैं
जिन्हें दुनिया की हासिल है मसर्रत
वो क्यों रंज़ूर होते जा रहे हैं
अमीर-ए-शहर ने साज़िश रची है
सितम भरपूर होते जा रहे हैं
शराब-ए-ग़म तो तुम ने पी है 'ख़ालिद'
वो क्यों मख़मूर होते जा रहे हैं
Khalid Nadeem Budauni