जो शोर कर रहे थे सियासत की ढाल पर
ख़ामोश हो गए हैं मेरे इक सवाल पर
मेरी नज़र से देख तो गूँगे नहीं हैं लोग
पाबंदियाँ लगी हुईं है बोलचाल पर
कैसे कोई घरौंदा बनाऊँ मैं ऐ ख़ुदा
बैठे हुए हैं साँप दरख़्तों की डाल पर
हर वक़्त उसकी याद में रहता हूँ मुब्तिला
है उसका इख़्तियार मेरे हर ख़याल पर
आसान हो जो मौत का वो रास्ता बता
या छोड़ दे ऐ यार मुझे मेरे हाल पर
Ayush