Dhirendra Pratap Singh

तुम्हारी आँख से ही मुख़्बिरी न हो पाई
इसीलिए तो कभी आशिक़ी न हो पाई

तो राएगाँ नहीं फिर क्या कहूँ मुहब्बत को
अगर वो लड़की मेरी ज़िन्दगी न हो पाई

वही मेरी भी शिकायत है जुगनुओं वाली
बहुत जले हैं मगर रोशनी न हो पाई

तुम्हारे बाद तुम्हारी तमाम यादों से
हज़ार कोशिशें की दोस्ती न हो पाई
Dhirendra Pratap Singh