समय का नाग

समय का यह नाग हर दिन डस रहा है
देख लो मैं स्याह होता जा रहा हूँ

हर तरफ़ से चल रही पछुआ हवायें
नियति घन बरसे बिना ही लौट जायें
फूल जिनकी राह में बोता रहा मैं
शूल बनकर हैं वही हर बार आये
मील के पत्थर हुए सब मीत परिजन
दौड़ता मैं राह होता जा रहा हूँ
देख लो मैं स्याह होता जा रहा हूँ

समय से पहले बुढ़ापा आ रहा है
सोच का कीड़ा हृदय को खा रहा है
रोज जीवन लड़ रहा नैराश्य तम से
श्वास समिधाओं को यह सुलगा रहा है
चाहता हूँ ख़ुद को मैंं वरदान करना
क्या करूँ पर आह होता जा रहा हूँ
देख लो मैं स्याह होता जा रहा हूँ

मुझे कुछ अज्ञात भय हर दिन डराते
कुछ विषैले स्वप्न नींदे तोड़ जाते
और कुछ किस्से कसैले गूँजते हैं
कान के परदों में हैं काँटे चुभाते
चाहता था मुक्त होना चाहतों से
पर अधूरी चाह होता जा रहा हूँ
देख लो मैं स्याह होता जा रहा हूँ
Dr Diwakar Dutta Tripathi 'ganjraha'

समय का नाग | We The Sukhanwar