द्रोण-भीष्म गर बोले होते शायद महासमर टल जाता
सोचो बीच सभा में नारी
दुष्ट दुःशासन खींचे साड़ी
कोई नही विरोध कर सका
थी शायद सबकी मति मारी
जब चौसर का खेल सजा था काश समय वो गर टल जाता
द्रोण-भीष्म गर बोले होते शायद महासमर टल जाता
भूमि न होती रक्तवर्ण की
लाशें गिद्ध-सियार न खाते
न घर में विधवाएँ रोती
न बच्चे अनाथ हो जाते
जिसकी भेंट चढ़े सेनानी, रण का काल कहर टल जाता
द्रोण-भीष्म गर बोले होते शायद महासमर टल जाता
चाल शकुनि की सफल न होती,
ना भीषम शरशैय्या पाते
पुत्रहीन धृतराष्ट्र न होते
द्रोण न छल से मारे जाते
निगल गया जो वीर हजारों ,ऐसा प्रबल भँवर टल जाता
द्रोण-भीष्म गर बोले होते शायद महासमर टल जाता
सुनो द्रोण गुरु! सुनो पितामह!
आज अगर चुप रह जाओगे
पूछेगा इतिहास अगर कल
तो उसको क्या बतालाओगे?
सिर्फ़ तुम्हारे इक विरोध से प्रलयी वैश्वानर टल जाता
द्रोण-भीष्म गर बोले होते शायद महासमर टल जाता
Dr Diwakar Dutta Tripathi 'ganjraha'