अंतस में प्रलय

हूँ सुषुप्त अंतस में कोई प्रलय दबाये
पीड़ामय यह मौन, नित्य दीमक-सा खाये

पक्षपात का जहर नित्य दम घोंट रहा है
मेरे मन को वातावरण कचोट रहा है
व्याध कभी यशवान नही हो पायेगा तू
तू पापी है! तेरे मन में खोट रहा है
जाग समय पर शाप नहीं वापस होते हैं
न जाने कब कौन बाल्मीकि हो जाये
हूँ सुषुप्त अंतस में कोई प्रलय दबाये

आत्ममुग्धता के रोगी को कौन बताये ?
जो मदांध है ,उसको राह कौन दिखलाये ?
जो शंका का रोग हृदय में पाले बैठा ,
उसको अपने मन की पीड़ा कौन बताये ?
अपने लिए लचीला, औरों ख़ातिर पत्थर
न जाने कब दलबदलू पलटी खा जाये ?
हूँ सुषुप्त अंतस में कोई प्रलय दबाये

दावानल बन सकती है छोटी चिंगारी
बड़े-बड़े तरु काट गिराये पतली आरी
समय शिखंडी को भी महारथी कर देता
समय छीन लेता वीरों की क्षमता सारी
परिवर्तन है नियम नहीं कुछ भी स्थिर है
जाने कब महिपाल, मही औंधे मुँह आये?
हूँ सुषुप्त अंतस में कोई प्रलय दबाये!
Dr Diwakar Dutta Tripathi 'ganjraha'