काश इसको याद रख पाते सखे!
दिन कभी सबके बुरे आते सखे!
जिन्हें आदत साज़िशों की लग गई
पीठ पर वह घाव कर जाते सखे!
जिस्म मिलते इश्क को बदनाम कर
अब कहाँ हैं लोग शरमाते सखे!
कुर्सियों पर जहाँ मतवाला कोई
हम वहाँ पे बहुत घबराते सखे!
Dr Diwakar Dutta Tripathi 'ganjraha'