दूसरों की हर कमी को देखता संसार में
क्यों नहीं तू झाँकता है स्वयं के किरदार में
ये जमाख़ोरी भला तू कर रहा किसके लिए?
चार दिन का तू मुसाफ़िर मौत के बाज़ार में
पीठ में खंज़र उतारा जब स्वयं के ख़ून ने
रूह तक घायल हुई कुछ ना किया प्रतिकार में
चाहे जितना दूध नागों को पिलाए आदमी
आएगा बदलाव तो कतई नहीं व्यवहार में
बाग़! तेरे रूप के आशिक़ बहुत मधुमास में
देखना है कौन ठहरेगा यहाँ पतझार में?
‘गँजरहा’ ताक़त कलम की क्रांति को पैदा करे
और ये साबित करे इतनी नहीं तलवार में
Dr Diwakar Dutta Tripathi 'ganjraha'