Musarif Husain Mansoori

तुझको पा लूँ या तेरे नाम प वारा जाऊँ
जंग में हार से बेहतर है कि मारा जाऊँ

ये भी इक ज़ुल्म है मुझ पर कि तेरे होते हुए
मैं किसी और के होठों से पुकारा जाऊँ

हर दरीचे को नहीं मिलती शुआ-ए-महताब
मैं भी क्यूँकर तेरी आँखों से निहारा जाऊँ

कैसे दिखते हैं यहाँ इश्क़ में मरने वाले
देखना जब कभी सूली से उतारा जाऊँ

बाद मरने के जनाज़े से सदा आएगी
पहले महबूब की गलियों से गुज़ारा जाऊँ
Musarif Husain Mansoori