Nivedan Mishra

कूज़ा-गरों के पास जा तैयार कर बदन
काफ़ी नहीं है एक कि दो-चार कर बदन

दरिया नहीं कि डूबे हुए पार जस्त में
तैराक आज़मा हुनर आ पार कर बदन

अच्छे भले हो किसलिए आएँगे चारा-गर
ग़र इश्क़ चाहिए है तो बीमार कर बदन

वरना वहीं थे मौज में जन्नत थी इश्क़ था
आए जो लोग-बाग यहाँ हार कर बदन

ऐ इश्क़ ऐसा कोई हुनर तेरे पास है
एक ख़्वाब को छू हाथ लगा यार कर बदन

इक और दे रही थी ये दुनिया भी काग़ज़ी
मैंने कहा बदन से कि इंकार कर बदन

ख़्वाहिश है रंग रूप नई शक्ल चाहिए
पहले जो तेरे पास है मिस्मार कर बदन
Nivedan Mishra