Muktak

हो गए विषधर सुधारस हो नहीं पाए
रह गए उलझे क्रमागत हो नहीं पाए
मोक्ष पाने के जतन करते रहे लेकिन
मोह ना छूटा तथागत हो नहीं पाए
DHEERENDRA DHEER

सब कुछ सुंदर और सलोना हो जाए
पावन घर का कोना-कोना हो जाए
कुछ जानूँ या न जानूँ पर ये जानूँ
वो छू ले तो माटी सोना हो जाए
DHEERENDRA DHEER

यंत्रवत् जीवन जिएँ वे, यंत्र होना है जिन्हें।
स्वार्थ की कुत्सित धरा का, तंत्र होना है जिन्हें।
व्यर्थ शब्दों को लुटाते वाक् से अनभिज्ञ हैं जो
मौन रहते हैं अधिक वे, मंत्र होना है जिन्हें।
GARIMA MISHRA

प्रेम निज नाम भूल जाता है
प्रेम आराम भूल जाता है
प्रेम मन में अगर उतर जाए
प्रेम परिणाम भूल जाता है
देवेश त्रिपाठी

मेरी कविता में शेर में होंगे
सांझ में हैं सबेर मे होंगे
राम को राम मे नहीं ढूंढो
राम शबरी के बेर मे होंगे
देवेश त्रिपाठी

दर्द, चाहत, ख़ुमार की बातें
रात, पतझर, बहार की बातें
तुमको तकरार सिर्फ़ करनी है
मुझको करनी है प्यार की बातें
देवेश त्रिपाठी

जीवन पग-पग फिसल रहा है आकर इसे सम्हालो तो।
सूख रहे रिश्तों के तरु में नीर नेह का डालो तो।
मतभेदों से क्या मिलना है चार दिनों के जीवन में।
मैं खो दूँ मेरे 'मैं' को तुम अपना अहं निकालो तो।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

है कहाँ तक उचित सब अकेले सहो
मैं न तुमसे कहूँ तुम न मुझसे कहो
ये गिरह मन की कैसे खुली पाओगे
मैं ख़फ़ा यदि रहूँ तुम अहं में रहो
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

घनी हो रात या हो दिन ये अक्सर ढूँढ़ लेते हैं
ये भौंरे की तरह फूलों का मंज़र ढूँढ़ लेते हैं
बड़े बेदर्द दिल इनके, तरस भी ये नहीं खाते
मुसीबत में कमाने के ये अवसर ढूँढ़ लेते हैं
Dheeraj kumar verma

ज़िंदगी का हम गुज़ारा क्या करेंगे?
अब भला ख़ुद से किनारा क्या करेंगे?
देखकर दिल की तुम्हारे मुफ़लिसी ।
देखकर रुतवा तुम्हारा क्या करेंगे?
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'