कभी रंज-ओ-ग़म से न फ़ुर्सत मिली है
मिली रंज-ओ-ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
निगाहों ने देखी न रोशन फ़जाएं
न दामन ने चूमीं महकती हवाएं
बहा अश्क बन कर लहू हसरतों का
खिली कोई दिल में न अब तक कली है
मिली रंज -ओ- ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
बहारों के दामन जले नफरतों से
लगाएं शजर हम कहां उल्फतों के
ख़यालो की नगरी में ज़ुल्मत का साया
मुहब्बत की सुनसान हर इक गली है
मिली रंज-ओ- ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
तबस्सुम में डूबे गुलों को न देखा
न पीको बुलाते पपीहों को देखा
न गुज़रा मेरा कोई दिन मुस्कुरा कर
न सो कर कोई रात मेरी ढली है
मिली रंज-ओ- ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
Asad Khan Lakhimpuri (Barwar)
मैं पथिक! पथ पर बहुत आनंदमय हूँ
तिमिरमय जग में विभा सब खोजते हैं
मैं अँधेरों में पला आलोकमय हूँ
ज़िन्दगी के लक्ष्य तुमको हों मुबारक
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ
साधना मेरी किसी सम्मान की प्यासी नहीं है
कर्मों की आराधना दरबार की दासी नहीं है
मैं दुःखों का स्वाद लेकर जी रहा हूँ
कल्पना मेरी सुखों की किंचित भी अभिलाषी नहीं है
शोक के जिन चक्रवातों में डूबता है जगत सारा
मैं उसी धारा प्रबल में, शांति से प्रवाहमय हूँ
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ
मुझको इच्छा ही नहीं कि देवता वरदान दें
विश्व अभिनंदन करे और लोग सब सम्मान दें
इस धरा से उस गगन तक, मैं विरक्ति का उपासक
ईश से अनुनय यही अनासक्ति को उत्थान दें
तिमिर के गिरिवर गहन में मैं सतत् गतिमान होकर
जगत के कल्याण हित में, मैं सदा प्रकाशमय हूँ
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ
जग मुझे चाहे, सराहे और ना ही प्यार दे
कृतज्ञता ज्ञापित करूँ ऐसा नहीं उपहार दे
मैं हूँ अभ्यासी अभावों का मुझे ना भाव दे
चाह मुझको कब रही मुझे प्रेम यह संसार दे
मुझको किसी के नेह के आधार ने जीवन दिया है
मैं उसी राग के आनंद में अनुरागमय हूँ
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ।
Kumar Vivek
रामलीला हो चुकी है
रामलीला हो चुकी है
दर्शकों के दल घरों में खो गये।
और पात्रों ने उतारे
मुकुट, बंदर के मुखौटे
काम जिनके पास था तो
काम पर वे लोग लौटे
धो लिया चेहरा ज़रा-सा
राक्षस सब आदमी से हो गये।
उड़ गई रंगत गुलाबी
खुल गया फिर रंग भूरा
फिर ग़रीबी मुस्कुराई
दिक़्क़तों ने ख़ूब घूरा
लौटने का मन नहीं था
पर ज़रूरत ने बुलाया तो गये।
क्या विजेता क्या पराजित
मंच के नीचे खड़े हैं
धनुष, रावण के खडग सब
एक झोले में पड़े हैं
आँख में आँसू भरे हैं
राम-रावण फिर दरी पर सो गये।
Gyan Prakash Akul
इस दीवाली राज महल में दीपक नहीं जले!
कपिलवस्तु में दीवाली है
लेकिन राजमहल ख़ाली है
दीप नगर के देखे राहुल बार-बार मचले
इस दीवाली राजमहल में दीपक नहीं जले!
ऐसा नहीं कि अपने पति पर
यशोधरा को गर्व नहीं है
फिर भी राजमहल में ऐसा-
लगता , कोई पर्व नहीं है,
भीतर का अँधियारा बाहर का प्रकाश निगले
इस दीवाली राजमहल में दीपक नहीं जले!
उधर तपस्वी वन में बैठा
देख रहा जग का अँधियारा
तन से ज्योति पुंज बहता है
हुआ प्रकाशित जंगल सारा
थोड़े किरण समूह वहाँ से जग की ओर चले
इस दीवाली राजमहल में दीपक नहीं जले!
धीरे-धीरे हुए प्रकाशित
सारे प्राणी धरती भर के
यह कैसे हो पाता, दिखते
यदि केवल अँधियारे घर के
नदियाँ तभी बहेंगीं जब पर्वत से हिम पिघले
इस दीवाली राज महल में दीपक नहीं जले!
Gyan Prakash Akul
करक चौथ के चन्द्र!
यह जो मुख पर आज उदासी झलक रही है,
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
देख अवनि पर चन्द्रमुखों की धवल चन्द्रिका,
कहाँ गया वह उज्ज्वलता का भान तुम्हारा?
अधर उषा की आज अरुणिमा लजा सकेंगे।
नयन निशा की नीरवता इस बार कहेंगे।
केश शिखर पर फिर उन्मादित पुष्प थकेंगे।
मुख-मकरंद मधुप-मन के अवलंब बनेंगे।।
करक चौथ के चन्द्र! न्यूनता तुम्हें खलेगी,
रूप प्रेयसी का कर लेगा पान तुम्हारा।
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
कहीं पायलें खग-दल का कलरव हर लेंगी।
कुछ दंतावलियाँ तारों को फीका कर देंगी।
कहीं अर्घ्य-व्रत से सतियाँ सौभाग्य वरेंगी।
प्रेम पहिन प्रिय-मनरंजक शृंगार करेंगी।
नक्षत्रों में रह धरती पर धरे रहें दृग!
बार-बार भटकेगा रे शशि! ध्यान तुम्हारा।
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
रहे पुरातन साक्षी शशि! प्रेमी जन के तुम।
भरते रहे अनगिनत क्षत विरही मन के तुम।
प्रहरी प्रेम पुष्प से सुरभित उपवन के तुम।
देव! सदा हरते तम प्रेमी जीवन के तुम।
अब न धैर्य खोओ तुम देख प्रिया मेरी,
तुमसे ही होगा क्षिति पर आह्वान तुम्हारा।
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'
कब लौटेंगे राम हमारे ?
वर्षों से इक रीत निभाकर
हम रावण को जला रहे हैं
सुनो समय के देव! बता दो
कब लौटेंगे राम हमारे?
'सदा सत्य की विजय हुई' हम जीवन-भर ये सुनते आए
अंत कहानी का अपनी भी, वही हृदय में बुनते आए
प्रायश्चित से कभी मंथराओं के मन भी पछताएँगे
हृदय थाम कर बैठे हैं हम, राम हमारे कब आएँगे?
हुआ सफल संकल्प विजय का
शंखनाद हो गया समर में
पूर्ण हुआ रण किंतु पूर्ण-
कब होंगे ये संग्राम हमारे?
अब इस युग के लोग विषैले बेर खिलाते प्यार जताकर
'यही दिशा है' कहते बनकर मित्र दिशा विपरीत दिखाकर
और सत्य के लिए लोग अब साथ नहीं लड़ते क़िस्सों में
पहले तय होता है कैसे क्या बाँटेंगे वो हिस्सों में
साध लिए जलते पुतलों से
धर्म-जाति के समीकरण तक
साध सकें जो 'सार' कभी
मन होंगे यूँ निष्काम हमारे?
यूँ तो हम विचलित होते है, ऐसी कितनी ही उलझन में
फिर भी उठती ज्वालाओं सँग ज्वार उठा करता है मन में
जब तक अंतर्मन में बाक़ी राम-विजय की ये अभिलाषा
तब तक इस युग की आँखों में भी बाक़ी है स्वर्णिम आशा
हम करके विश्वास निभाते
सदा रहेंगे रीत हमारी
होंगे जय के पर्व, पक्ष में
होंगे सब परिणाम हमारे!
Swarika Kirti
राम भीतर जाग जाएँ
आओ संशय के तिमिर को, हम हृदय से त्याग पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।
स्वार्थ के इस कल्पतरु को,
त्याग की पावन इच्छा दें।
नेह से रीते हृदय को,
शबरी वाली इक तृषा दें।
भ्रातृ-द्रोही इस समय में,
हम विभीषण-बोध साधें।
सत्य के दुर्जेय पथ पर,
धर्म की मर्यादा बाँधें।
सिद्ध हो जीवन हमारा, जो अहिल्या अनुराग पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।
दंभ के दस शीश ढोकर,
घूमते संसार में हम।
छल-कपट के स्वर्ण-मृग के,
पंथ पर लाचार हैं हम।
कब तलक फिर जटायु ही,
पाप से लड़ता मरेगा।
कब तलक नीलकंठ बन कर,
युग विषैला घूँट पिएगा।
आओ बनकर सेतु हम भी, असीम सत्य बेदाग़ पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।
बाँधकर तरकश भुजा में,
एक प्रतिज्ञा आज धर लें।
क्रोध, लोभ, विकार जितने,
भस्म उनका रूप कर लें।
आग भीतर की जगाकर,
दूर सारे क्लेश कर दें।
द्वेष की यह लंक ढहकर,
प्रेम का अवधेश कर दें।
दीप बनकर आत्मा के, ख़ुद-ब-ख़ुद ही जाग पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।
Dayanand Tripathi Vayakul
क्या नहीं तुमको पता, माँ!
क्या नहीं तुमको पता, माँ!
जो तुम्हें कहकर बताऊँ?
तुम मेरा मन सुन रही हो,
गीत तुमको क्या सुनाऊँ?
वे पिता हैं, तो सहज संकोच है उनसे हमारा
माँ तुम्हीं कह दो न उनसे इस हृदय का हाल सारा
वे विधाता हैं, हमें उनका लिखा स्वीकार तो है
पर थके मन को तुम्हारी गोद पर अधिकार तो है
छोड़कर आँचल तुम्हारा
मैं भला किस ओर जाऊँ?
ये युगों से कह रहा संसार इसका सार हो तुम
पार इस संसार के, उस पार का संसार हो तुम
किंतु हम अज्ञानियों को ज्ञान इतना ही रहा है
जो किसी से कह न पाए वो सदा तुमसे कहा है
मौन वो संवाद, शब्दों में
उसे कैसे समाऊँ?
मानती हूँ, हैं अकारण तो नहीं जग की व्यथाएँ
कौन जाने कौन लिखता है जगत की सब कथाएँ?
या हमारी इस कहानी का हमें कुछ सार दे दो
या कहानी में, कहानी को नया विस्तार दे दो
भूमिका अपनी अँधेरों में
भला कब तक निभाऊँ?
Swarika Kirti
लक्ष्य हमारे बहुत बड़े हैं
हम कमज़ोर नहीं हैं लेकिन
लक्ष्य हमारे बहुत बड़े हैं
हमको दुनिया के हर खण्डहर
में जाकर है दीप जलाना
हमको हर इक बसते घर की
नीवों को मज़बूत बनाना
हमें बहुत कुछ कहना है बस
इसीलिए चुपचाप खड़े हैं
जो गीले थे, हैं या होंगे
वे सब के सब नयन हमारे
जिनमें चुभे हुए हैं काँटे
वे सब के सब चरण हमारे
उन घायल पाँवों के नीचे
हम कब से गुमनाम पड़े हैं
युद्ध समापन से पहले ही
क्या अपने हथियार फेंक दें
भँवरों के चक्कर से डरकर
क्या अपनी पतवार फेंक दें
हम हैं उन तिनकों के वंशज
जो आँधी से युद्ध लड़े हैं!
Gyan Prakash Akul
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
बनारस की रंगीन सुब्हें कहां हैं
अवध की महकती वो शामें कहां हैं
कहां ज़िंदगी के मुनव्वर फ़साने
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
मुहब्बत के सब खेत बंजर बनें हैं
वो नग़्मात कोयल के खंज़र बने हैं
उजड़ने लगे तितलियों के ठिकाने
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
असद मैं हूं-ओ-मेरी तन्हाइयां हैं
हर इक सिम्त ज़ुल्मत की परछाइयां हैं
चले हो किसे हाल अपना सुनाने
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
Asad Khan Lakhimpuri (Barwar)