Doha

मैं बंजारन प्रेम की, एक मिलन की आस।
लेना ना मुझको पड़े, फिर से जन्म उदास।।
Purnima Jaiswal

मैं बंजारन प्रेम की, इक पानी की बूंद।
सागर से मिलने चली, अपनी आंखें मूंद।।
Purnima Jaiswal

उन हाथों का शुक्रिया, जिसने दिया उछाल ।
उन हाथों का शुक्रिया, जिसने लिया संभाल।।
Purnima Jaiswal

सरिता-सी बहती रहे, जो नित सुब्हो-शाम।
पीड़ा-दुःख सह कर हँसे, नारी उसका नाम।
Vishal Ojha 'Ehsaas'

चोर उचक्के लूटकर,कर देते हैं क्लीन
घीसू घिस-घिस मर गया,रहा दीन का दीन
Bajrangi Lal

हिन्दी को जबसे चुना, मिला नया परिधान
माँ के आँचल ने दिया, नित्य मान सम्मान

हिन्दी पर कुछ लिख सकूँ, नहीं मुझे यह ज्ञान
रस छन्दों से दूर हूँ, मैं बालक अनजान
देवेश त्रिपाठी

Hindi ko jabse chuna, mila naya paridhaan
Maan ke aanchal ne diya, nitya maan sammaan

Hindi par kuch likh sakoon, nahin mujhe yah gyaan
Ras chandon se door hoon, main baalak anjaan
देवेश त्रिपाठी

ہندی کو جبسے چنا، ملا نیا پری دھان
ماں کے آنچل نے دیا، نِتْیہ مان سمان

ہندی پر کچھ لکھ سکوں، نہیں مجھے یہ گیان
رس چندوں سے دور ہوں، میں بالک انجَان
देवेश त्रिपाठी

पढ़ें लिखे नौकरियां ढूंढें अनपढ़ बाँचे ज्ञान
गाँव जवार की ऐसी तैसी लंठ हुए परधान
Bajrangi Lal

माँ ईश्वर के रूप में ,है अनुपम उपहार
सकल तीर्थ माँ के चरण,यही स्वर्ग का द्वार।।

शब्द मुझे मिलते नहीं,माँ का लिखूँ बखान।
छोटा सा यह शब्द ही,कर दे भव से पार।।

माँ के रिश्ते का नहीं,कोई कहीं विकल्प।
शीतल चंदन छाँव सी,है वात्सल्य अपार।।

विधना तेरे लेख का,यह कैसा अध्याय।
संतानों पर बोझ है,बूढ़ी माँ का प्यार।।

जीवन भर करते रहें,जननी का सम्मान।
उन्नति चूमे देहरी, सुखी रहे परिवार।।
Archana Dwivedi

श्वेत वसन माँ भारती,कर दो यह उपकार।
रस,छंदों की साधना,हो मेरा संसार।।

तृष्णा माया मोह में उलझी है यह देह।
कृपा करो वागेश्वरी, हो मेरा उद्धार।।

जाति धर्म से हो परे, मेरा मानस ज्ञान।
पीड़ा सबकी बाँट लूँ, जग में भर दूँ प्यार।।

कर तेरी आराधना,मूर्ख बने विद्वान।
वीणा जीवन में करे,भावों का संचार।।

बंधन सारे तोड़कर,तुमसे जोड़ी प्रीत।
नित्य अर्चना कर रही, माँ मै सौ-सौ बार।।
Archana Dwivedi

ऐसी हैं ये आफतें, जिनका है नहीं तोड़
जैसे-तैसे कट रही, तिनका-तिनका जोड़
Mohit Subran (मोहित सुब्रन)